पीरियड्स: दर्द, बेज्ज़ती और दाग़…

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पंच स्पेशल: पीरियड्स…ये एक ऐसा नाम है जिसको एक औरत या लड़की सबके सामने लेने मे शर्माती है या हिचकिचाती है। क्या यह एक ऐसी समस्या है जो एक औरत ज़ात को शर्मसार कर देती है? अगर एक बात सोची जाए तो पीरियड्स कोई ऐसी समस्या नहीं है कि अगर एक औरत इससे जूझ रही है तो उसे शर्मिंदा होना पड़े या फिर घर मे बैठना पड़े।
पीरियड्स को अन्य नामों से भी जाना जाता है और वो है मासिक धर्म, रजोधर्म या माहवारी (Menstural Cycle or MC) ….

एक औरत या लड़की जब माहवारी के समय से गुज़रती है तब उसे एक कलंक के समान समझा जाता है, जैसे की उसने कोई अपराध या जुर्म किया हो या फिर जुर्म या अपराध करने वाले से भी गया गुजरा समझा जाता है। माहवारी चक्र महीने में एक बार होता है, सामान्यतः 28 से 32 दिनों में एक बार। हालांकि अधिकतर मासिक धर्म का समय तीन से पांच दिन रहता है परन्तु दो से सात दिन तक की अवधि को सामान्य माना जाता है और इन्ही तीन से पांच दिनी के लिए एक औरत को अछूत माना जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? जब पीरियड्स प्रकृति की देन है तो को प्रकृति पर रहने वाले लोग उस बात को नहीं स्वीकारते हैं।

10 से 15 साल की आयु मे लड़की को पीरियड्स का सामना करना पड़ जाता है। 10 से 15 साल की लड़की को जब पहली बार पीरियड्स आते है तो उसको नहीं पता होता कि यह क्यों और कैसे हो रहा है, लेकिन आज कल की लड़कियों को इस बारे मे इतना जागरूक कर दिया गया है कि आजकल की लड़कियों को सब पता होता है कि उनको क्या और कैसे करना है और पीरियड्स के बारे मे लड़कियों को पूरी जानकारी स्कूल और घर से दी जाती है। हालांकि अगर लड़कियों को खुद इस बारे मे कुछ जानना हो तो वह इंटरनेट के माध्यम से पढ़ लेती हैं और इसकी पूरी जानकारी ले लेती है।

अभी पिछले कुछ साल से लड़कियों को इस बारे मे पूरी जानकारी रहती है लेकिन अगर बात करें 15 से 20 साल पहले कि तो तब की लड़कियां पीरियड्स के बारे मे कुछ भी नहीं जानती थी और जब पहली बार उनको पीरियड्स आता था तो वो एक मासूम की भांति कुछ समझ ही नहीं पाती थी और अपनी माँ से इस बारे मे बात करती थी। हालाँकि कुछ लड़कियां तो अपनी माँ से भी पीरियड्स को लेकर बात करने मे संकोच करती है या फिर सोच मे पड़ जाती थी कि पीरियड्स के बारे मे कैसे खुले शब्दों मे बात करी जाए।

पहली बार पीरियड्स से जूझि एक मासूम लड़की जिसको पीरियड्स को लेकर कोई ज्ञान नहीं-
जैसे की सबको पता है कि पीरियड्स 10 से 15 साल की उम्र के बीच मे आता है। एक लड़की जिसको पहली बार 12 से 13 साल की उम्र मे पीरियड्स आये। वह लड़की उस दिन घर मे अपने भाई के साथ थी जो की उससे एक साल उम्र मे बड़ा है। उस लड़की की माँ कही बाहर गयी हुई थी। जिस दिन उस लड़की को पहली बार पीरियड्स आये उस दिन उसकी माँ उसके साथ नहीं थी तो वो अपने पीरियड्स का दर्द किससे कहती। वह छोटी सी लड़की बार बार टॉयलेट जाए तो उसके खून आता और वह लड़की भयभीत हो गयी की आखिरकार ऐसा क्या हुआ की उसके साथ यह दिक्कत उत्पन्न हो गयी। जब वह बार बार टॉयलेट जाए तो उस लड़की का भाई उससे पूछे की तुम हर 10 मिनट मे टॉयलेट क्यों जा रही हो। उस समय मे पीरियड्स इतना बड़ा मसला था कि वह लड़की किसी को भी पीरियड्स के बारे मे बताने संकोच कर रही थी। उस लड़की ने तबतक यह बात छुपा कर राखी जब तक उसकी माँ वापस नहीं आ गयी और उसकी माँ 2 दिन बाद वापस आयी। वो दो दिन उस लड़की के लिए इस तरह थे जैसे की वह किसी बहुत बड़ी परेशानी से जूझ रही है। उस लड़की ने अकेले ही अपना दर्द झेला और परेशान हुई। अगर पीरियड्स को शुरुवाती दौर से इतना हाईलाइट न किया गया होता तो वह छोटी सी लड़की अपना दर्द अपने भाई या फिर किसी के साथ बाँट लेती ताकि उसे अकेले किसी भी तरह की परेशानी न झेलनी पड़ती।

यह ऊपर लिखी बात आपके लिए महज़ एक कहानी होगी लेकिन किसी लड़की से पूछिए यह उसके लिए समाज की तरफ से दिया गया एक भोज है। यह सिर्फ एक लड़की के ऊपर बीती हुई बात नहीं है ऐसे बहुत सी लड़कियाँ जो इस बोझ से अकेले जूझी हैं और मैं यह पूरे यकीन से बता सकती हूँ कि आज भी बहुत सी ऐसी लड़कियां है जो पीरियड्स के बारे मे बात करने से संकोच करती हैं। उनका संकोच करना मुझे कही से जायज़ नहीं लगता क्योकि पीरियड्स एक प्राकर्तिक देन है ना कि उनका खुद से बनाया हुआ कोई चीज़ जिससे वह इतना संकोच करती हैं। इसलिए मेरा सभी लड़कियों से अनुरोध है कि वह पेरियडस को समस्या की तरह न देखें और अगर कोई इसे समस्या बताए भी तो उसे वक वाजिब जवाब के साथ समझाए न कि सुनकर चली आये।

अक्सर पीरियड्स के समय लगे हुए दाग को देख कर लड़कियां खुद ही हाइपर हो जाती हैं। पहली बात पीरियड्स के समय लड़कियों को अपनी सेफ्टी करके चलनी चाहिए और अगर किसी वजह से तब भी उनके पीरियड्स का स्पॉट लग जाता है तो उन्हें घबराना या शर्माना नहीं चाहिए, खूनी जब अपने ऊपर खून के लगे दागो से नहीं शर्माता तो हम अपने ही जिस्म के खून से क्यों शर्माए…. कर जो लोग इन पीरियड्स के लगे दागों को एक विवादित टॉपिक बाना देते हैं या हास्य टॉपिक बना देते है उनके ऊपर मझे शर्म आती है। जो इसे देख कर मज़े लेते हैं वह बस एक बार यह सोच ले की शायद उनकी बेटी, बहन, पत्नी, माँ को देख कर कोई उनसे मज़े न ले या फिर आप कभी किसी लड़की के साथ कहीं बैठे हो और उसके साथ ऑन द स्पॉट ऐसा कुछ हो जाए तो आपको शर्मसार महसूस हो इससे अच्छा है कि जब भी किसी लड़की या औरत को ऐसी किसी सिचुएशन मे देखे तो उसका साथ दें न की उसे एक टॉपिक बनाए।

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